क्या बताएं यारो

क्या बताएं यारो कैसा ये खुदा  लगता है
जिस्म से रूह तक ये ही बसा लगता है।
जिनको मालूम नही उनके लिए कुछ न  हो बेशक
जिनको मालूम है उनको हर शख्स खुदा लगता है।
"उपवास करून जर
देव खूश होत असेल
तर या जगात कित्येक
दिवस उपाशी पोटी
असणारा भिखारी हा
सर्वात जास्त सुखी राहिला
असता."
कोई सानी नही तेरी रेहमतो के सागर का,

तूने एतबार दिया इंसान पर इंसान का,

धूल के कण भी न थे हम तेरी दुनिया के,

माथे का चंदन बना दिया इस संसार का,

कोई सजदा नही, 

तेरी याद का कोई फेरा नही,

फिर भी साॅसे चल रही है, 

ये भरोसा है बस तेरे प्यार का...

बस तेरे प्यार का...

मानव मन की अवस्था

मानव मन की अवस्था : 

रात के अँधेरे से डरते हें
निरंकार से क्यू नही..?
सपनो से डरते हें
सतगुरु से क्यू नही..?
बिच्छु से डरते हें
गुनाहों से क्यू नही..?
स्वर्ग में जाना चाहते हें
सत्संग में क्यू नही..?
रिश्वत देते हें
सेवा क्यू नही..?
मनमत पर चलते हें
गुरुमत पर क्यू नही..?
गाने गाते हें
सिमरन क्यू नही..?
सत्संग सुनते हें
अमल करते क्यू नही..?
Pal pal tarse the us pal ke liye ,
pal aaya bhi toh kuch pal ke liye ...
Socha tha us pal ko khubsoorat pal banaye ge 
par woh pal ruka bhi toh kuch pal ke liye..(Missing Samagam Days)

सतगुरु प्यारे

सतगुरु प्यारे इन्होने 
इतना बचाया हैं
हसने लगी ज़िन्दगी,
मन मुस्कुराया हैं
दिव्यदृष्टि देकर के,
अँधेरा मिटाया हैं
नज़रे नूरानी से,
स्वरुप दिखाया हैं
गिर गए थे हम तो,
गुरु ने उठाया हैं
अवगुण नहीं देखे,
गले से लगाया हैं
अनमोल खज़ाना देकर,
बादशाह बनाया हैं
विषयों के कीचड़ में,
गिरने से बचाया हैं
मुरझाया मन का चमन,
गुरु ने खिलाया हैं
भूल गए थे हसना,
गुरु ने हसाया हैं
संसार सागर से,
गुरु ने ताराया हैं
मन पर जन्मो से,
गफलत का पर्दा था
दुई का पर्दा हटा कर,
नींद से जगाया हैं
कैसे भूलूँ रहमत,
तन मन चमकाया है।।।।।।
तेरे संत है ये फरिशतों से कम
नही रहबर
इनमे रहने का सलीका सिखा दे
मुझको।                                
है छोटी सी ज़िन्दगी, तकरारें किस लिए...
रहो एक दूसरे के दिलों में यह दीवारें किस लिए ।
गुरु साडा है प्रेम सिखान्दा, इस नु असां अपना लईए
छड नफ़्रत दी खटटी नु, असां प्रेम दी हटटी पा लईए
तोड फ़ोड ईर्षा अत्ते वैर दे भांडे, भाई चारे दा इक्‍क गुल्दस्ता बणा  लईए
इक दूजे दे जो बनण  सहारे, ऐसे फ़ुल्ल इस गुल्लदस्ते विच्च सजा लईए
गुरु साडा हे प्रेम सिखान्दा इस नू ..................................

दाते बखशी दात आसाँ नू हुसन ज़वानी अकलाँ दी
क्‍यों न इस तो कम लाईए असां, प्रेम मरियादा भग्ती दे
कर अपनी खवाईशा नु कम जो है इस विच्च शुक्र मना लाईए
करिए बार बार सजदा इस रब्ब नु, अपने तो निचले वल झाती ज़रा कु पा लईए
गुरु साडा हे प्रेम सिखान्दा इस नू ...................................

प्रेम दे ढ़ाई अक्षरा दे नाल,अपना जीवन सजा लईए
कॅड के नफ़रत अपने दिल्ला विच्चों प्रेम दी जोत जगा लईए
सुरिन्द्र बट सुतली अपने मॅन दी, विच प्यार दे मोती पा लेइए
एसी सुंदर माला दे नाल सतगुरु नाम ध्या लईए
गुरु साडा है प्रेम सिखान्दा इस नू ...................................
 
_--- सेवक जी  
There is no greater religion than doing well to others, and no greater meanness than causing suffering to others.
Patience with self is confidence,
Patience with family is love,
Patience with others is respect,
Patience with god is Faith.